Friday, 17 February 2017

सफलता के लिए विद्यार्थियों को ध्यान रखनी चाहिए आठ बातें

    सफलता के लिए विद्यार्थियों को ध्यान रखनी चाहिए आठ बातें


जिंदगी में हम सब हमेशा सीखते रहते हैं और हम सब विद्यार्थी हैंआचार्य चाणक्य की  इन नीतियों का पालन करके कोई भी विद्यार्थी उत्तम तथा सही रूप से शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो सकता है और अपनी जिंदगी में हर मुकाम हासिल करने की काबिलियत हासिल कर सकता है। इन्ही नीतियों में से एक के बारे में हम विस्तार से आपको बताएँगे ताकि आप इन्हें अच्छे से समझ सकें और इन्हें अपना कर अपनी जिंदगी में अहम् बदलाव ला सकें  .

कामक्रोधौ तथा लोभं स्वायु श्रृड्गारकौतुरके।
अतिनिद्रातिसेवे च विद्यार्थी ह्मष्ट वर्जयेत्।।

अर्थात- विद्यार्धी के लिए आवश्यक है कि वह इन आठ दोषों का त्याग करे:
1.काम,
2.क्रोध
3.लोभ
4.स्वादिष्ठ पदार्थों या भोजन
5.श्रृंगार
6.हंसी-मजाक
7.निद्रा (नींद)
8.और अपनी शरीर सेवा में अधिक समय न दे।
इन आठों दोषों के त्यागने से ही विद्यार्थी को विद्या प्राप्त हो सकती है। अब इन दोषों के बारे में थोडा विस्तार से जानते हैं ताकि आप इन्हें ठीक से समझ सकें :
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1. काम भावनाओं से बचें :
जिस व्यक्ति के मन में काम वासना उत्पन्न हो जाती है, वह हर समय अशांत रहने लगता है। ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए सही-गलत कोई भी रास्ता अपना सकता है। कोई विद्यार्थी अगर काम वासना के चक्कर में पड़ जाए, तो वह पढ़ाई छोड़कर दूसरे कामों की ओर आकर्षित होने लगता है। उसका सारा ध्यान केवल अपनी काम वासना की पूर्ति की ओर लगने लगता है और वह पढ़ाई-लिखाई से बहुत दूर हो जाता है। इसलिए विद्यर्थियों को ऐसी भावनाओं के बचना चाहिए।

2.प्रयास करें की क्रोध न करें :
क्रोध में आदमी अँधा हो जाता है, उसे सही गलत की पहचान नहीं रह जाती है, और जो व्यक्ति क्रोधी स्वभाव है और छोटी से छोटी बात पर भी गुस्सा होकर कुछ ऐसा कर बैठता है जिसके लिए आगे जाकर पछताना पड़े वैसे लोग क्रोध आने पर किसी का भी बुरा कर बैठते है।

ऐसे स्वभाव वाले व्यक्ति का मन कभी भी शांत नहीं रहता। विद्या प्राप्त करने के लिए मन का शांत और एकचित्त होना बहुत जरूरी होता है। अशांत मन से शिक्षा प्राप्त करने पर मनुष्य केवल उस ज्ञान को सुनता है, उसे समझ कर उसका पालन कभी नहीं कर पाता। इसलिए शिक्षा प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपने क्रोध पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी होता है।

3. देख परायी चुपड़ी न ललचाओ जी ( लोभ न करें ):
लालच बुरी बला है, हम सबने से सुना और पढ़ा है, लालची इंसान अपने फायदे के लिए किसी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं और किसी के साथ भी धोखा कर सकते हैं। ऐसे व्यक्ति सही-गलत के बारे में बिलकुल नहीं सोचते। जिस व्यक्ति के मन में दूसरों की वस्तु पाने या हक़ छीनने की भावना होती है और हमेशा उसे पाने की योजना बनाने में ही लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी अपनी विद्या के बारे में सतर्क नहीं रह सकता  और अपना सारा समय अपने लालच को पूरा करने में गंवा देता है। विद्यार्थी को कभी भी अपने मन में लोभ या लालच की भावना नहीं आने देना चाहिए।

4. स्वादिष्ठ पदार्थ तथा भोजन के चक्कर में हमेशा न रहें:
जिस इंसान की जीभ उसके वश में नहीं होती, वह हमेशा ही स्वादिष्ठ व्यंजनों की खोज में लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति अन्य बातों को छोड़ कर केवल खाने को ही सबसे ज्यादा अहमियत देता है। कई बार स्वादिष्ठ व्यंजनों के चक्कर के मनुष्य अपने स्वास्थ तक के साथ समझौता कर बैठता है। विद्यार्थी को अपनी जीभ पर कंट्रोल रखनी चाहिए, ताकी वह अपने स्वास्थय और अपनी विद्या दोनों का ध्यान रख सके।

5. श्रृंगार (सजना-सवरना) और अपनी शरीर सेवा में अधिक समय न दे:
जिस विद्यार्थी का मन सजने - सवरने में लग जाता है वह अपना ज्यादातर समय इन्ही बातों में गवां देता है ऐसे व्यक्ति खुद को हर वक्त सबसे सुन्दर और अलग दिखने के लिए ही मेहनत करते रहते हैं, और इसी वजह से हमेश उनके दिमाग में सौंदर्य, अच्छे पहनावे और रहन -सहन से जुडी बातें ही घुमती रहती हैं सजने-सवरने के बारे में सोचने वाला व्यक्ति कभी भी एक जगह ध्यान केंद्रित करके विद्या नहीं प्राप्त कर पाता। विद्यार्थी को ऐसे परिस्थितियों से बचना चाहिए।

6. हंसी-मजाक में समय व्यर्थ न करें :
किसी अच्छे विद्यार्थी का एक सबसे महत्वपूर्ण गुण होता है गंभीरता। विद्यार्थी को शिक्षा प्राप्त करने और जीवन में सफलता पाने के लिए इस गुण को अपनाना बहुत जरूरी होता है। जो विद्यार्थी अपना सारा समय हंसी-मजाक में व्यर्थ कर देता है, वह कभी सफलता नहीं प्राप्त कर पाता। विद्या  प्राप्त करने के लिए मन का स्थित होना बहुत जरूरी होता है और हंसी-मजाक में लगा रहना वाला विद्यार्थी अपने मन को कभी स्थिर नहीं रख पाता।

7.निद्रा : आवश्यकता से अधिक सोने से बचें :
अमूमन स्वस्थ मनुष्य के लिए ६-८ घंटे सोना आवश्यक होता है, विद्यार्थोयों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की वे आवश्यकता से अधिक निद्रा से बचें। अत्यधिक निद्रा से शरीर में हमेशा थकान बनी रहती है और अगर शरीर थका हो तो ध्यान केन्द्रित करना मुश्किल हो जाता है, और अध्ययन के लिए दिमाग का केन्द्रित होना अत्यंत आवश्यक होता है

Best Chanakya Quotes In Hindi


                              Best Chanakya Quotes In Hindi



"जैसे एक बछड़ा हज़ारो गायों के झुंड मे अपनी माँ के पीछे चलता है। उसी प्रकार आदमी के अच्छे और बुरे कर्म उसके पीछे चलते हैं।" आचार्य चाणक्य


"विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।" आचार्य चाणक्य


"सबसे बड़ा गुरु मंत्रअपने राज किसी को भी मत बताओ। ये तुम्हे खत्म कर देगा।" आचार्य चाणक्य


"आदमी अपने जन्म से नहीं अपने कर्मों से महान होता है।" आचार्य चाणक्य


"एक समझदार आदमी को सारस की तरह होश से काम लेना चाहिए और जगहवक्त और अपनी योग्यता को समझते हुए अपने कार्य को सिद्ध करना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"ईश्वर मूर्तियों में नहीं है। आपकी भावनाएँ ही आपका ईश्वर है। आत्मा आपका मंदिर है।" आचार्य चाणक्य


"पुस्तकें एक मुर्ख आदमी के लिए वैसे ही हैंजैसे एक अंधे के लिए आइना।" आचार्य चाणक्य


"एक राजा की ताकत उसकी शक्तिशाली भुजाओं में होती है। ब्राह्मण की ताकत उसके आध्यात्मिक ज्ञान में और एक औरत की ताक़त उसकी खूबसूरतीयौवन और मधुर वाणी में होती है।" आचार्य चाणक्य


"आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लेंवह सदा दुःख ही देता है।" आचार्य चाणक्य


"गरीब धन की इच्छा करता हैपशु बोलने योग्य होने कीआदमी स्वर्ग की इच्छा करते हैं और धार्मिक लोग मोक्ष की।" आचार्य चाणक्य


"जो गुजर गया उसकी चिंता नहीं करनी चाहिएना ही भविष्य के बारे में चिंतिंत होना चाहिए। समझदार लोग केवल वर्तमान में ही जीते हैं।" आचार्य चाणक्य


"संकट में बुद्धि भी काम नहीं आती है।" आचार्य चाणक्य


"जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब ना करें।" आचार्य चाणक्य



"दुर्बल के साथ संधि ना करें।" आचार्य चाणक्य


"किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है।" आचार्य चाणक्य


"संधि करने वालों में तेज़ ही संधि का होता है।" आचार्य चाणक्य


"कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर टूट जाता है।" आचार्य चाणक्य


"संधि और एकता होने पर भी सतर्क रहें।" आचार्य चाणक्य


"शत्रुओं से अपने राज्य की पूर्ण रक्षा करें।" आचार्य चाणक्य


"शिकारपरस्त राजा धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर लेता है।" आचार्य चाणक्य


"भाग्य के विपरीत होने पर अच्छा कर्म भी दु:खदायी हो जाता है।" आचार्य चाणक्य


"शत्रु की बुरी आदतों को सुनकर कानों को सुख मिलता है।" आचार्य चाणक्य


"चोर और राज कर्मचारियों से धन की रक्षा करनी चाहिए।" आचार्य चाणक्य

"जन्म-मरण में दुःख ही है।" आचार्य चाणक्य


"ये मत सोचो की प्यार और लगाव एक ही चीज है। दोनों एक दूसरे के दुश्मन हैं। ये लगाव ही है जो प्यार को खत्म कर देता है।" आचार्य चाणक्य


"दौलतदोस्त ,पत्नी और राज्य दोबारा हासिल किये जा सकते हैंलेकिन ये शरीर दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता।" आचार्य चाणक्य


"पृथ्वी सत्य पे टिकी हुई है। ये सत्य की ही ताक़त हैजिससे सूर्य चमकता है और हवा बहती है। वास्तव में सभी चीज़ें सत्य पे टिकी हुई हैं।" आचार्य चाणक्य


"फूलों की खुशबू हवा की दिशा में ही फैलती हैलेकिन एक व्यक्ति की अच्छाई चारों तरफ फैलती है।" आचार्य चाणक्य


"जो हमारे दिल में रहता हैवो दूर होके भी पास है। लेकिन जो हमारे दिल में नहीं रहतावो पास होके भी दूर है।" आचार्य चाणक्य


"जैसे एक सूखा पेड़ आग लगने पे पुरे जंगल को जला देता है। उसी प्रकार एक दुष्ट पुत्र पुरे परिवार को खत्म कर देता है।" आचार्य चाणक्य


"जिस आदमी से हमें काम लेना हैउससे हमें वही बात करनी चाहिए जो उसे अच्छी लगे। जैसे एक शिकारी हिरन का शिकार करने से पहले मधुर आवाज़ में गाता है।" आचार्य चाणक्य


"वो व्यक्ति जो दूसरों के गुप्त दोषों के बारे में बातें करते हैंवे अपने आप को बांबी में आवारा घूमने वाले साँपों की तरह बर्बाद कर लेते हैं।" आचार्य चाणक्य


"एक आदर्श पत्नी वो है जो अपने पति की सुबह माँ की तरह सेवा करे और दिन में एक बहन की तरह प्यार करे और रात में एक वेश्या की तरह खुश करे।" आचार्य चाणक्य


"वो जो अपने परिवार से अति लगाव रखता है भय और दुख में जीता है। सभी दुखों का मुख्य कारण लगाव ही है,इसलिए खुश रहने के लिए लगाव का त्याग आवशयक है।" आचार्य चाणक्य


"एक संतुलित मन के बराबर कोई तपस्या नहीं है। संतोष के बराबर कोई खुशी नहीं है। लोभ के जैसी कोई बिमारी नहीं है। दया के जैसा कोई सदाचार नहीं है।" आचार्य चाणक्य

"ऋणशत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।" आचार्य चाणक्य

"वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती हैअर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते हैं।" ~आचार्य चाणक्य


"शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।" आचार्य चाणक्य

"सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।" आचार्य चाणक्य


"अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।" आचार्य चाणक्य


"भूख के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है।" आचार्य चाणक्य


"विद्या ही निर्धन का धन है।" आचार्य चाणक्य


"शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।" आचार्य चाणक्य


"सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।" आचार्य चाणक्य


"किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी शत्रु का साथ ना करें।" आचार्य चाणक्य


"आलसी का ना वर्तमान होता हैना भविष्य।" आचार्य चाणक्य


"सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।" आचार्य चाणक्य


"ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते हैं।" आचार्य चाणक्य


"सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"समय का ध्यान नहीं रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निर्विघ्न नहीं रहता।" आचार्य चाणक्य


"दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है।" आचार्य चाणक्य


"चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।" आचार्य चाणक्य


"पहले निश्चय करिएफिर कार्य आरम्भ करें।" आचार्य चाणक्य


"भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।" आचार्य चाणक्य



"अर्थ और धर्मकर्म का आधार है।" आचार्य चाणक्य


"शत्रु दण्ड नीति के ही योग्य है।" आचार्य चाणक्य


"कठोर वाणी अग्नि दाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुँचाती है।" आचार्य चाणक्य


"व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।" आचार्य चाणक्य


"शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करें।" आचार्य चाणक्य


"अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता ना करें।" आचार्य चाणक्य


"मंत्रणा को गुप्त रखने से ही कार्य सिद्ध होता है।" आचार्य चाणक्य


"योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।" आचार्य चाणक्य



"एक अकेला पहिया नहीं चला करता।" आचार्य चाणक्य


"अविनीत स्वामी के होने से तो स्वामी का ना होना अच्छा है।" आचार्य चाणक्य


"जिसकी आत्मा संयमित होती हैवही आत्मविजयी होता है।" आचार्य चाणक्य


"स्वभाव का अतिक्रमण अत्यंत कठिन है।" आचार्य चाणक्य


"धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।" आचार्य चाणक्य


"दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।" आचार्य चाणक्य


"आग में आग नहीं डालनी चाहिए। अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है।" आचार्य चाणक्य


"दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है।" आचार्य चाणक्य


"दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती अर्थात आवश्कयता के अनुसार साधन जुटाने चाहिए।" ~आचार्य चाणक्य


"कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।" आचार्य चाणक्य



"कल का कार्य आज ही कर लें।" आचार्य चाणक्य


"सुख का आधार धर्म है।" आचार्य चाणक्य


"अर्थ का आधार राज्य है।" आचार्य चाणक्य


"राज्य का आधार अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना है।" आचार्य चाणक्य


"प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेता विहीन राज्य भी संचालित होता रहता है।" आचार्य चाणक्य


"वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है।" आचार्य चाणक्य


"वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।" आचार्य चाणक्य


"ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता हैसम्पादन करता है।" आचार्य चाणक्य


"आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।" आचार्य चाणक्य


"जहाँ लक्ष्मी (धन) का निवास होता हैवहाँ सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।" आचार्य चाणक्य

"इन्द्रियों पर विजय का आधार विनम्रता है।" आचार्य चाणक्य


"प्रकृति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।" आचार्य चाणक्य


"शासक को स्वयं योगय बनकर योगय प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दुबारा उन पर विचार करें।" आचार्य चाणक्य


"अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाएँ।" आचार्य चाणक्य


"समस्त कार्य पूर्व मंत्रणा से करने चाहिएं।" आचार्य चाणक्य


"विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त ना रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।" आचार्य चाणक्य


"लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है।" आचार्य चाणक्य


"मन्त्रणा की संपत्ति से ही राज्य का विकास होता है।" आचार्य चाणक्य


"भविष्य के अन्धकार में छिपे कार्य के लिए श्रेष्ठ मंत्रणा दीपक के समान प्रकाश देने वाली है।" आचार्य चाणक्य


"मंत्रणा के समय कर्तव्य पालन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"मंत्रणा रूप आँखों से शत्रु के छिद्रों अर्थात उसकी कमजोरियों को देखा-परखा जाता है।" आचार्य चाणक्य


"राजागुप्तचर और मंत्री तीनों का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता है।" आचार्य चाणक्य


"कार्य-अकार्य के तत्व दर्शी ही मंत्री होने चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"छः कानों में पड़ने से (तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।" आचार्य चाणक्य


"अप्राप्त लाभ आदि राज्यतंत्र के चार आधार हैं।" आचार्य चाणक्य


"आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता।" आचार्य चाणक्य


"शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।" आचार्य चाणक्य


"राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते हैं।" आचार्य चाणक्य


"राजतंत्र से संबंधित घरेलू और बाह्यदोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।" आचार्य चाणक्य


"राजनीति का संबंध केवल अपने राज्य को समृद्धि प्रदान करने वाले मामलों से होता है।" आचार्य चाणक्य


"ईर्ष्या करने वाले दो समान व्यक्तियों में विरोध पैदा कर देना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"चतुरंगणी सेना (हाथीघोड़ेरथ और पैदल) होने पर भी इन्द्रियों के वश में रहने वाला राजा नष्ट हो जाता है।" ~आचार्य चाणक्य


"जुए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरे नहीं होते हैं।" आचार्य चाणक्य


"कामी पुरुष कोई कार्य नहीं कर सकता।" आचार्य चाणक्य


"पूर्वाग्रह से ग्रसित दंड देना लोक निंदा का कारण बनता है।" आचार्य चाणक्य


"धन का लालची श्रीविहीन हो जाता है।" आचार्य चाणक्य


"दंड से सम्पदा का आयोजन होता है।" आचार्य चाणक्य


"दंड का भय ना होने से लोग अकार्य करने लगते हैं।" आचार्य चाणक्य


"दण्डनीति से आत्मरक्षा की जा सकती है।" आचार्य चाणक्य


"आत्मरक्षा से सबकी रक्षा होती है।" आचार्य चाणक्य


"कार्य करने वाले के लिए उपाय सहायक होता है।" आचार्य चाणक्य


"कार्य का स्वरुप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है।" आचार्य चाणक्य


"अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती।" आचार्य चाणक्य


"कार्य के मध्य में अति विलम्ब और आलस्य उचित नहीं है।" आचार्य चाणक्य


"कार्य-सिद्धि के लिए हस्त-कौशल का उपयोग करना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"अशुभ कार्यों को नहीं करना चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"समय को समझने वाला कार्य सिद्ध करता है।" आचार्य चाणक्य


"समय का ज्ञान ना रखने वाले राजा का कर्म समय के द्वारा ही नष्ट हो जाता है।" आचार्य चाणक्य


"नीतिवान पुरुष कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही देश-काल की परीक्षा कर लेते हैं।" आचार्य चाणक्य



"परीक्षा करने से लक्ष्मी स्थिर रहती है।" आचार्य चाणक्य


"मूर्ख लोग कार्यों के मध्य कठिनाई उत्पन्न होने पर दोष ही निकाला करते हैं।" आचार्य चाणक्य


"कार्य की सिद्धि के लिए उदारता नहीं बरतनी चाहिए।" आचार्य चाणक्य


"दूध पीने के लिए गाय का बछड़ा अपनी माँ के थनों पर प्रहार करता है।" आचार्य चाणक्य



"जिन्हें भाग्य पर विश्वास नहीं होताउनके कार्य पुरे नहीं होते।" आचार्य चाणक्य

"प्रयत्न ना करने से कार्य में विघ्न पड़ता है।" आचार्य चाणक्य


"जो अपने कर्तव्यों से बचते हैंवे अपने आश्रितों परिजनों का भरण-पोषण नहीं कर पाते।" आचार्य चाणक्य


"जो अपने कर्म को नहीं पहचानतावह अंधा है।" आचार्य चाणक्य


"प्रत्यक्ष और परोक्ष साधनों के अनुमान से कार्य की परीक्षा करें।" आचार्य चाणक्य


"निम्न अनुष्ठानों (भूमिधन-व्यापारउधोग-धंधों) से आय के साधन भी बढ़ते हैं।" आचार्य 
चाणक्य



"विचार ना करके कार्य करने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है।" आचार्य चाणक्य